सुकमाः जहां जाने से डरते हैं सरकारी कर्मचारी, वहां एक ही बाइक से गए SP-DM

छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में मौजूद ग्रामीण इलाकों में सरकारी अफसर-कर्मचारी जाने से डरते हैं. कर्मचारियों का डर खत्म करने और ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति भरोसा जगाने के लिए सुकमा के कलेक्टर और एसपी ने खुद पहल की है. इन दोनों अफसरों ने खुद को खतरे में डालकर मोटरसाइकिल से कई किलोमीटर लंबी यात्रा की और विकास कार्यों का जायजा लिया.
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छत्तीसगढ़ के घने जंगलों के बीच एक मोटरसाइकिल भागी जा रही है. मोटरसाइकल पर 2 शख्स सवार हैं. पहले शख्स के कमर में वायरलेस सेट, गले में एके-47 लटकी है. पीछे बैठे शख्स की छवि ऑफिसर जैसी दिखती है. दोनों टीवीएस बाइक पर सवार होकर नक्सलियों के मांद की ओर बढ़े जा रहे हैं. ये दोनों शख्स हैं सुकमा के कलेक्टर चंदन कुमार और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा. जिन इलाकों में नक्सलियों का दबदबा रहता था, जहां सुरक्षाबलों की टोली के साथ भी पहुंचना चुनौतीपूर्ण होता था वहां पर बाइक के जरिए पहुंचकर जिले के टॉप अधिकारियों ने जनता को संदेश देने का काम किया है.

घने जंगलों में मौजूद ग्रामीण इलाकों में सरकारी अफसर-कर्मचारी जाने से डरते हैं. कर्मचारियों का डर खत्म करने और ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति भरोसा पैदा करने के लिए कलेक्टर और एसपी ने खुद पहल की है. इन दोनों अफसरों ने खुद को खतरे में डालकर मोटरसाइकिल से कई किलोमीटर लंबी यात्रा की और विकास कार्यों का जायजा लिया.

इन दोनों सीनियर अधिकारियों की इस बाइक यात्रा की तुलना स्थानीय लोग फिल्म 'शोले' के किरदार जय-वीरू से कर रहे हैं. समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक जिलाधिकारी चंदन कुमार ने बताया, "हम एक नियत स्थान तक वाहनों से गए, और सुरक्षाकर्मियों की मदद भी ली, जहां की सड़कों पर विस्फोटक होने की आशंका होती है. उसके बाद हमने पुलिस अधीक्षक के साथ मोटरसाइकिल की सवारी की. रास्ते में घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ा. सजग और सतर्क रहे, और कोई दिक्कत नहीं आई."

सुकमा जिले का किस्टाराम थाना क्षेत्र वह इलाका है, जहां नक्सलियों का दबदबा है. सरकार यहां कई निर्माण कार्य करा रही है. कलेक्टर चंदन कुमार ने बताया, "हम एक नियत स्थान तक वाहनों से गए, और सुरक्षाकर्मियों की मदद भी ली, जहां की सड़कों पर विस्फोटक होने की आशंका होती है उसके बाद हमने पुलिस अधीक्षक के साथ मोटरसाइकिल की सवारी की. रास्ते में घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ा. सजग और सतर्क रहे, और कोई दिक्कत नहीं आई."

इस दौरे की प्लानिंग के बारे में एसपी शलभ सिन्हा बताते हैं, "आम तौर पर लोग किस्टाराम तक आसानी से जाते नहीं हैं, कर्मचारी तक नहीं जाते, क्योंकि नक्सलियों की गतिविधियां वहां ज्यादा होती हैं, लेकिन जिलाधिकारी ने उस क्षेत्र में जाने की इच्छा जताई, ताकि वहां विकास कार्यों, राशन वितरण व्यवस्था आदि को करीब से देखा जाए और लोगों की समस्याओं को समझा जाए, किस्टाराम पुलिस थाने के अंतर्गत पालुड़ी में सीआरपीएफ और पुलिस का शिविर भी हैं, और हम वहां भी गए."